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Spiritual Teachings
सोपान 1: प्राथमिक
चरण 1
श्रवण एवं प्रश्नोत्तरी के माध्यम से
🙏 जय गीता-भागवत 🙏
1शास्त्र की परिभाषा
शास्त्र की महिमा को समझने के लिए वीडियो पूरा देखें और उसके बाद प्रश्नोत्तरी अवश्य दें।
📖 शास्त्र की परिभाषा
- वे दिव्य ग्रंथ जो परमेश्वर के आदेशानुसार/निर्देशानुसार मानव मात्र को शासित और नियंत्रित करते हैं, उन्हें शास्त्र कहते हैं।
🪔 शास्त्र शब्द का अर्थ
- शास्त्र शब्द का अर्थ: “शासती इति शास्त्रम्”।
- शास्त्र परमेश्वर की वाणी है। इसलिए परमेश्वर की वाणी का नाम शास्त्र है।
- शास्त्र की वाणी मानव समाज को शासित और नियंत्रित करने के लिए प्रकट हुई है।
- परमेश्वर के वचन, वाक्य और शब्द पूर्ण होते हैं, जबकि मनुष्य के वचन या वाक्य अपूर्ण होते हैं।
✨ शास्त्र की महिमा
- धर्म और अध्यात्म से संबंधित कोई भी कार्य शास्त्र-वचनों के विपरीत नहीं करना चाहिए, बल्कि शास्त्र-वचनों के अनुसार करना चाहिए।
- गीता १६:२३ में भगवान श्री कृष्ण शास्त्र की महिमा बताते हुए कहते हैं कि जो शास्त्र की विधि को त्यागकर मनमाने ढंग से भक्ति कार्य करता है, उसे सिद्धि, सुख और परम गति की प्राप्ति नहीं होती।
📚 ब्रह्म सूत्र: शास्त्रयोनित्वात्
- ब्रह्म सूत्र (वेदांत सूत्र) में सूत्र “शास्त्रयोनित्वात्” आया है।
- “शास्त्रयोनित्वात्” का अर्थ है कि परमात्मा/ब्रह्म को जानने का एक ही स्रोत और उपाय शास्त्र है।
- जो शास्त्र को नहीं मानता, वह ब्रह्म अर्थात परम ब्रह्म परमेश्वर सर्वोच्च सत्ता का ज्ञान कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता।
2शास्त्र हमारी माता है
शास्त्र हमारी माता है, इस विषय को समझने के लिए वीडियो पूरा देखें और उसके बाद प्रश्नोत्तरी अवश्य दें।
📌 मुख्य बिंदु
- परमेश्वर है या नहीं, इस विषय का प्रमाण शास्त्र ही है।
- वेदांत का सूत्र है - शास्त्रयोनित्वात् अर्थात परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण शास्त्र के वचन हैं।
- शास्त्र के वचन को माने बिना परमेश्वर की खोज करने पर एक जन्म तो क्या, एक करोड़ जन्म में भी परमेश्वर कौन है, यह ज्ञान प्राप्त होना संभव नहीं होगा।
🪔 माता और पिता का उदाहरण
- पुत्र के लिए पिता को जानने का एकमात्र उपाय अपनी माता के शब्दों पर विश्वास करना है।
- माता के शब्दों पर विश्वास करके ही कोई अपने पिता का ज्ञान सरलता से प्राप्त कर सकता है। यदि माता के शब्दों पर विश्वास नहीं किया तो पिता का ज्ञान होना संभव ही नहीं है।
- इसी प्रकार जो माता रूपी शास्त्र के वचनों पर विश्वास नहीं करता, वह पिता रूपी परमेश्वर के बारे में करोड़ जन्म में भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।